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यूपी में ब्राह्मण वोटों पर कांग्रेस की नजर, सियासी आधार मजबूत करने की कवायद


नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। कांग्रेस द्वारा अजय राय की जगह आराधना मिश्रा मोना को उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष नियुक्त करना अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़े संगठनात्मक फेरबदल को दर्शाता है। कांग्रेस के इस विजन में ब्राह्मणों से संपर्क साधने की स्पष्ट कोशिश दिखाई देती है, जो एक पुराने फॉर्मूले का पुनरावलोकन प्रतीत होता है।

नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। कांग्रेस द्वारा अजय राय की जगह आराधना मिश्रा मोना को उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष नियुक्त करना अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़े संगठनात्मक फेरबदल को दर्शाता है। कांग्रेस के इस विजन में ब्राह्मणों से संपर्क साधने की स्पष्ट कोशिश दिखाई देती है, जो एक पुराने फॉर्मूले का पुनरावलोकन प्रतीत होता है।

हालांकि, इससे समाजवादी पार्टी (एसपी) के अध्यक्ष अखिलेश यादव के नए रूप में सामने आए 'पीडीए' नारे से टकराव की संभावना भी है।

यदि कांग्रेस लक्षित ब्राह्मण संपर्क के माध्यम से उत्तर प्रदेश में अपनी किस्मत को फिर से संवारने का प्रयास करती है, तो वह उस रणनीति को फिर से अपना रही होगी जिसे उसके नेतृत्व ने एक दशक पहले तत्कालीन राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर के कथित मार्गदर्शन में अपनाया था।

2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले, कांग्रेस ने किशोर को अपनी पुनरुद्धार रणनीति तैयार करने के लिए नियुक्त किया था।

खबरों में कहा गया था कि चुनाव सलाहकार ने पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरे को पेश करने का समर्थन किया था, उनका कहना था कि इससे कांग्रेस इस वर्ग से फिर से जुड़ने का प्रयास कर सकती है।

तब कथित तौर पर शीला दीक्षित का नाम सामने आया था। दिल्ली की तीन बार की मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश के दिग्गज कांग्रेस नेता उमा शंकर दीक्षित की बहू, जिनका नाम उनकी ब्राह्मण पहचान और उच्च जाति के मतदाताओं के बीच उनकी संभावित लोकप्रियता से स्पष्ट रूप से जुड़ा था।

किशोर की रणनीति स्पष्ट रूप से इस धारणा पर आधारित थी कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की संख्या कुल मतदाताओं का लगभग 10 से 12 प्रतिशत अनुमानित है।

हालांकि, यह प्रयोग बुरी तरह विफल रहा और कांग्रेस ने कुल 403 विधानसभा क्षेत्रों में से 114 पर चुनाव लड़ते हुए केवल सात सीटें जीतीं।

संयोगवश, प्रशांत किशोर अब सक्रिय राजनीति में आ गए हैं और बिहार में निर्वाचित विधायक हैं।

हालांकि 2021 के उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों ने संकेत दिया कि केवल जाति ही प्रभावी संगठनात्मक आधार का विकल्प नहीं हो सकती, फिर भी कांग्रेस इस बार आश्वस्त दिख रही है, क्योंकि उसे 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन से लाभ मिला है।

लेकिन ब्राह्मणों को लुभाने का कांग्रेस का कोई भी प्रयास अखिलेश यादव की संभावित पहुंच को चुनौती दे सकता है, जहां पिछले दो वर्षों में सपा प्रमुख जानबूझकर सार्वजनिक उपस्थिति के अर्थ को व्यापक बना रहे हैं।

मूल रूप से 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्याक' के रूप में उच्चारित, यह संक्षिप्त रूप एसपी के 2024 अभियान का संगठनात्मक नारा बन गया।

हाल ही में, अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों को आश्वस्त करने का प्रयास किया है कि वे भी इस शब्द का हिस्सा हैं।

लखनऊ में ब्राह्मणों की सभा को संबोधित करते हुए सपा प्रमुख ने कहा कि पीडीए में 'पी' का अर्थ 'पंडित' भी है, और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर समुदाय की उपेक्षा और अपमान करने का आरोप लगाया।

विश्लेषकों ने इसे महत्वपूर्ण माना क्योंकि दशकों से सपा की छवि मुस्लिम-यादव (एमवाई) गठबंधन पर आधारित थी।

पीडीए को गैर-यादव ओबीसी और दलितों की ओर अपना आधार व्यापक बनाने की एक योजना के रूप में देखा गया।

पंडितों पर नए सिरे से जोर देने से भाजपा विरोधी एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने के प्रयासों का संकेत मिलता है।

--आईएएनएस

एमएस/

Date & Time : 2026-10-07 19:10:02

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