
नागदा। मध्य प्रदेश शासन साहित्य अकादमी प्रदेश के प्रत्येक जिले के साहित्यिक इतिहास के दस्तावेजीकरण और प्रकाशन का कार्य सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ पूरा करेगी। आगामी एक माह के भीतर लगभग 12 जिलों का साहित्यिक इतिहास प्रकाशित कर जनता के सामने लाया जाएगा। इसके साथ ही तहसील और ब्लॉक स्तर पर पूर्व में गठित पाठक मंचों को सक्रिय करने और बजट के अभाव में रुकी प्रतिष्ठित पत्रिका 'साक्षात्कार' के नियमित प्रकाशन को पुनः पटरी पर लाने की ठोस कार्ययोजना तैयार कर ली गई है। यह बात मध्य प्रदेश शासन हिंदी साहित्य अकादमी के निदेशक पद का कार्यभार तीसरी बार संभालने वाले विकास दवे ने भोपाल स्थित अकादमी कार्यालय में दैनिक देशबंधु संवाददाता से हुई विशेष बातचीत के दौरान कही। साक्षात्कार के दौरान मध्य प्रदेश शासन बाल साहित्य सृजन पीठ की निदेशक मीनू पांडे और लघु शोध संस्थान के गिरिजेश सक्सेना भी उपस्थित रहे।
निदेशक का कार्यभार संभालने के बाद अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए विकास दवे ने बताया कि उनके पूर्व कार्यकाल के तीन प्रमुख अधूरे संकल्पों को इस बार मूर्त रूप दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश के सभी जिलों के साहित्यिक अवदान को संजोने की उनकी महत्वाकांक्षी योजना के तहत 12 से 14 जिलों का इतिहास पूर्व में तैयार कराया जा चुका था, जिसे अब युद्धस्तर पर प्रकाशित कराया जाएगा। इसके अलावा ब्लॉक और तहसील स्तर पर स्थापित लगभग 170 पाठक मंचों को पुनर्जीवित कर नई पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएंगी ताकि पूरे प्रदेश में एक स्वस्थ साहित्यिक विमर्श खड़ा किया जा सके। साहित्य में व्यावसायिकता के सवाल को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि साहित्य सृजन स्वांतः सुखाय का माध्यम है, व्यापार नहीं। आज भी 99 प्रतिशत साहित्यकार आर्थिक अभावों के बीच सृजन कर रहे हैं और स्वयं के व्यय पर कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, मंच के गिने-चुने मंचीय कवियों के आधार पर पूरे साहित्यिक समाज का आकलन नहीं किया जा सकता।
साहित्य जगत के समक्ष मौजूद समकालीन वैचारिक चुनौतियों पर गहन चिंता व्यक्त करते हुए निदेशक ने कहा कि वर्तमान में साहित्य का क्षेत्र विभिन्न वैचारिक आधारों पर खेमों में बंटता जा रहा है, जो चिंताजनक है। समाज साहित्यकारों से एकजुटता और मार्गदर्शन की अपेक्षा रखता है, लेकिन जब रचनाकार ही आपस में बंट जाएंगे तो समाज को दिशा देना असंभव होगा। उन्होंने आह्वान किया कि साहित्यकारों को वामपंथ और दक्षिणपंथ के अंतहीन विवादों से ऊपर उठकर 'राष्ट्रपंथ' को अंगीकार करना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रहित ही सर्वोपरि है।
नवोदित और युवा रचनाकारों को मार्गदर्शित करते हुए विकास दवे ने पाश्चात्य अंधानुकरण से दूर रहने की नसीहत दी। उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों, भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं को कोसकर कोई भी रचनाकार कालजयी अथवा यशस्वी नहीं बन सकता। युवा पीढ़ी को स्थापित और वरिष्ठ साहित्यकारों के क्लासिक साहित्य का गहन अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने चेताया कि तात्कालिक प्रसिद्धि पाने के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपरा को अपमानित करने वाले छद्म प्रवृत्तियों से युवाओं को बचना चाहिए, क्योंकि अपनी मिट्टी और अस्मिता से जुड़कर ही वास्तविक और सार्थक साहित्य का सृजन संभव है।
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