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एम्स भोपाल में हाइपोस्पेडियस का हाईटेक इलाज: अब माइक्रो-सर्जिकल तकनीक से दूर होगा बच्चों में जन्मजात टेढ़ापन

भोपाल. राजधानी स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) अब उन बच्चों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है जो हाइपोस्पेडियस जैसी जन्मजात विकृति से जूझ रहे हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें नवजात शिशुओं में पेशाब का मार्ग सामान्य स्थान के बजाय नीचे की ओर होता है, और अक्सर इसके साथ 'कार्डी' (लिंग का टेढ़ापन) की समस्या भी जुड़ी होती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रत्येक 200 में से एक बच्चा इस समस्या के साथ जन्म लेता है। यदि समय पर इसका उपचार न किया जाए, तो यह न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि बच्चे के भविष्य और आत्मविश्वास को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

विशेष प्रशिक्षण से बढ़ी उपचार की क्षमता

एम्स भोपाल के बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. अभिनव सिंह ने हाल ही में हैदराबाद में आयोजित एक लाइव ऑपरेटिव वर्कशॉप में इस सर्जरी का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया है। इस उपलब्धि पर एम्स के कार्यपालक निदेशक प्रो. डॉ. माधवानन्द कर ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि अब संस्थान में और भी जटिल मामलों का समाधान संभव होगा। डॉ. सिंह के इस नए कौशल और आधुनिक माइक्रो-सर्जिकल तकनीकों के समावेश से अब सर्जरी के परिणाम पहले से कहीं अधिक सटीक और संतोषजनक होने की उम्मीद है।

समग्र मूल्यांकन के लिए समर्पित क्लिनिक

मरीजों की सुविधा को देखते हुए एम्स भोपाल में प्रत्येक गुरुवार को एक विशेष 'हाइपोस्पेडियस क्लिनिक' संचालित किया जा रहा है। यहाँ विशेषज्ञों द्वारा मरीज की स्थिति का गहन मूल्यांकन किया जाता है। रोग की गंभीरता के आधार पर सर्जरी की योजना बनाई जाती है, जो जरूरत पड़ने पर एक या उससे अधिक चरणों में पूरी की जाती है। संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मल्टी-डिस्पिलनरी केयर है, जहाँ प्लास्टिक सर्जरी विभाग के साथ-साथ यूरोलॉजी और पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के विशेषज्ञ मिलकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं।

सफल परिणामों से बढ़ा विश्वास

संस्थान में अब तक हाइपोस्पेडियस की कई सफल सर्जरी की जा चुकी हैं, जिनमें मूत्रमार्ग को उसकी सामान्य स्थिति में सफलतापूर्वक पुनर्निर्मित किया गया है। आधुनिक उपकरणों और हाईटेक सुविधाओं के कारण रिकवरी दर में काफी सुधार देखा गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि एम्स में इस सुविधा के सुदृढ़ होने से अब स्थानीय और आसपास के क्षेत्र के मरीजों को बड़े शहरों या महंगे निजी अस्पतालों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

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