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UPI पर MDR की नई व्यवस्था टल सकती है, जनवरी 2027 तक बढ़ेगी तारीख


नई दिल्ली। यूपीआई भुगतान को लेकर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR व्यवस्था फिलहाल टल सकती है। 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाली इस नई फीस व्यवस्था को जनवरी 2027 तक आगे बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। समयसीमा नजदीक आने के बावजूद भुगतान उद्योग से जुड़े संगठनों और कंपनियों ने तैयारियों के लिए अतिरिक्त समय की मांग की है।

मर्चेंट संगठनों, फिनटेक कंपनियों और भुगतान सेवा प्रदाताओं की ओर से नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के सामने समयसीमा बढ़ाने का अनुरोध रखा गया है। मामले को लेकर वित्त मंत्रालय के साथ भी बातचीत चल रही है। माना जा रहा है कि NPCI जल्द ही इस पर अपना फैसला ले सकता है।

नई व्यवस्था की तैयारी को लेकर उठे सवाल

उद्योग से जुड़े पक्षों का कहना है कि MDR लागू करने के लिए तकनीकी और नीतिगत स्तर पर अभी कई तैयारियां पूरी होना बाकी हैं। यूपीआई के अलग-अलग प्रकार के भुगतानों के लिए अलग-अलग शुल्क दरें तय होने से व्यवस्था को समझने और लागू करने में भी दिक्कतें सामने आ रही हैं।

खास चिंता इस बात को लेकर है कि किस तरह के लेन-देन पर कितनी फीस लागू होगी और भुगतान के समय सिस्टम संबंधित श्रेणी की स्वत: पहचान किस तरह करेगा। उद्योग का कहना है कि इन मुद्दों पर पर्याप्त स्पष्टता के बिना व्यवस्था लागू करने से व्यापारियों और भुगतान कंपनियों के सामने व्यावहारिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

दिवाली से पहले MDR लागू करने पर चिंता

अक्टूबर के दौरान दिवाली समेत कई प्रमुख त्योहारों के कारण बाजार में खरीदारी बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे समय में डिजिटल भुगतान पर नई फीस लागू होने से व्यापारियों की लागत बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

उद्योग का तर्क है कि त्योहारी सीजन में कारोबार पहले से ही अतिरिक्त खर्च और प्रतिस्पर्धा का सामना करता है। ऐसे में नई भुगतान लागत जोड़ने से व्यापारियों पर दबाव बढ़ सकता है। आशंका यह भी है कि कुछ कारोबारी अतिरिक्त खर्च की भरपाई ग्राहकों से शुल्क लेकर करने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे खरीदारी पर असर पड़ सकता है।

2,000 रुपये से ज्यादा के UPI भुगतान पर MDR

MDR वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की सुविधा के बदले व्यापारी से भुगतान व्यवस्था से जुड़े संस्थानों को मिलता है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के कुछ यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत यानी 40 बेसिस पॉइंट की दर निर्धारित की गई है।

उदाहरण के तौर पर 2,000 रुपये के लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत के हिसाब से 8 रुपये और 10,000 रुपये के भुगतान पर 40 रुपये शुल्क बनता है। NPCI ने इस व्यवस्था को 15 अक्टूबर 2026 से लागू करने की योजना बनाई थी।

हालांकि, उद्योग का कहना है कि केवल शुल्क दर तय कर देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए भुगतान प्रणालियों, बैंकिंग नेटवर्क और भुगतान एग्रीगेटरों में जरूरी तकनीकी बदलाव भी करने होंगे।

अलग-अलग भुगतान श्रेणियां बनीं चुनौती

यूपीआई में MDR को लेकर सबसे बड़ी जटिलताओं में से एक अलग-अलग भुगतान श्रेणियों के लिए अलग शुल्क दरें हैं। कार्ड भुगतान में व्यापारियों और भुगतान नेटवर्क के बीच लेन-देन की श्रेणी पहचानने के लिए मर्चेंट कैटेगरी कोड का इस्तेमाल किया जाता है। यूपीआई में इसी तरह की पहचान और शुल्क निर्धारण को लेकर तकनीकी चुनौतियां सामने आ रही हैं।

यूटिलिटी बिल, कर्ज की किस्त, पूंजी बाजार में निवेश और दूसरे वित्तीय भुगतान अलग-अलग श्रेणियों में आते हैं। इनमें से कई भुगतान ऐसे हैं, जिनके लिए पहले लोग नेट बैंकिंग, IMPS, NEFT या RTGS जैसी बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल करते थे। इन माध्यमों में बैंक अपने निर्धारित शुल्क लेते थे, लेकिन कार्ड भुगतान जैसी MDR व्यवस्था लागू नहीं थी।

ब्रोकिंग कंपनियों ने भी जताई आपत्ति

पूंजी बाजार से जुड़ी कंपनियों ने भी प्रस्तावित MDR व्यवस्था को लेकर अपनी चिंता सामने रखी है। ब्रोकिंग क्षेत्र से जुड़े पक्षों का कहना है कि जब कोई निवेशक अपने ट्रेडिंग खाते में यूपीआई के माध्यम से पैसा जमा करता है, तो यह मुख्य रूप से धन हस्तांतरण की प्रक्रिया है।

उनका तर्क है कि ऐसे भुगतान में ब्रोकर को लेन-देन से सीधे कोई अतिरिक्त आय नहीं होती। इसलिए इस तरह के भुगतान पर MDR लगाने को लेकर सवाल उठाए गए हैं और संबंधित नियामकीय स्तर पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई गई है।

लोन की किस्तों में भी तकनीकी पेंच

कर्ज की किस्तों के भुगतान को लेकर भी प्रस्तावित व्यवस्था में तकनीकी समस्या सामने आ रही है। NPCI के निर्देशों के अनुसार ऑटोपे मैंडेट के जरिए होने वाले लोन भुगतान पर 5 रुपये का निश्चित शुल्क रखा गया है।

समस्या उस समय पैदा हो सकती है जब ग्राहक के बैंक खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण ऑटो-डेबिट असफल हो जाए। ऐसी स्थिति में ग्राहक बाद में खुद यूपीआई के जरिए अपनी किस्त जमा करता है। भुगतान प्रणाली यदि इस लेन-देन को सामान्य वित्तीय संस्थान को किया गया भुगतान मानती है, तो उस पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होने की स्थिति बन सकती है।

NPCI की ओर से लोन भुगतान के लिए 5 रुपये की निश्चित फीस का प्रावधान स्पष्ट किया गया है। लेकिन उद्योग का कहना है कि बैंक और भुगतान एग्रीगेटरों के मौजूदा तकनीकी सिस्टम में हर मामले में लोन किस्त और सामान्य वित्तीय भुगतान के बीच स्वत: अंतर करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है।

जनवरी तक टल सकती है व्यवस्था

इन तकनीकी दिक्कतों के अलावा अलग-अलग भुगतान श्रेणियों और शुल्क निर्धारण को लेकर भी उद्योग में असमंजस है। इसी वजह से भुगतान क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने NPCI से नई व्यवस्था लागू करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा है।

अब मुख्य नजर NPCI के फैसले पर है। यदि प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है तो 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाली MDR व्यवस्था को जनवरी 2027 तक टाला जा सकता है। इससे पहले भुगतान कंपनियों और संबंधित संस्थानों को तकनीकी ढांचा तैयार करने तथा नियमों को लेकर जरूरी स्पष्टता हासिल करने का अतिरिक्त समय मिल जाएगा।

Date & Time : 2026-10-08 06:47:26

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