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मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी से तमिलनाडु में ताड़ीबंदी पर फिर छिड़ी बहस


तिरुचिरापल्ली, 15 जून (आईएएनएस)। तमिलनाडु में ताड़ी (टोडी) निकालने और उसकी बिक्री पर लगभग चार दशक पुराने प्रतिबंध को हटाने की मांग एक बार फिर चर्चा में आ गई है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने राज्य सरकार को ताड़ी उत्पादन और विपणन को बढ़ावा देने के उपायों पर विचार करने की सलाह दी है, जिसके बाद इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हो गई है।

तिरुचिरापल्ली, 15 जून (आईएएनएस)। तमिलनाडु में ताड़ी (टोडी) निकालने और उसकी बिक्री पर लगभग चार दशक पुराने प्रतिबंध को हटाने की मांग एक बार फिर चर्चा में आ गई है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने राज्य सरकार को ताड़ी उत्पादन और विपणन को बढ़ावा देने के उपायों पर विचार करने की सलाह दी है, जिसके बाद इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हो गई है।

किसानों, ताड़ी निकालने वाले श्रमिकों, कृषि विशेषज्ञों और ग्रामीण आजीविका से जुड़े संगठनों का कहना है कि यदि ताड़ी उत्पादन को नियमन के साथ अनुमति दी जाए तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और राज्य में बड़ी संख्या में मौजूद ताड़ (पालमायरा) के पेड़ों का संरक्षण भी होगा।

यह मामला तेनकासी जिले में एक ताड़ी निकालने वाले व्यक्ति से जुड़े एक प्रकरण की सुनवाई के दौरान सामने आया। सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति बी. पुगालेंधी ने सरकार को सुझाव दिया कि ताड़ी निकालने को प्रोत्साहित किया जाए और इसके पोषण संबंधी तथा अन्य लाभकारी गुणों का प्रचार-प्रसार किया जाए।

गौरतलब है कि तमिलनाडु में 1 जनवरी 1987 से ताड़ी निकालने और उसकी बिक्री पर मिलावट की आशंका को देखते हुए प्रतिबंध लगा हुआ है। हालांकि, पड़ोसी राज्य केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में लाइसेंस प्राप्त दुकानों के माध्यम से ताड़ी की बिक्री की अनुमति है।

मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी का स्वागत करते हुए तमिलनाडु टोडी मूवमेंट के समन्वयक सी. नल्लासामी ने कहा कि उनका संगठन लंबे समय से इस प्रतिबंध को हटाने की मांग कर रहा है। उनके अनुसार ताड़ी केवल मादक पेय नहीं, बल्कि पारंपरिक खाद्य उत्पाद है और सरकार को पड़ोसी राज्यों की तर्ज पर नीति अपनानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि प्रतिबंध हटने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिलेगा और ताड़ तथा नारियल आधारित व्यवसायों पर निर्भर हजारों परिवारों की आजीविका मजबूत होगी।

नल्लासामी का कहना है कि ताड़ के पेड़ पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है, ये विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में आसानी से विकसित होते हैं और कई पारंपरिक उद्योगों का आधार हैं।

कृषि अर्थशास्त्री ए.पी. पलानीचामी ने भी कहा कि ताड़ी पीढ़ियों से ग्रामीण खाद्य संस्कृति का हिस्सा रही है और प्राकृतिक किण्वन के कारण इसमें अल्कोहल की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। उन्होंने बताया कि केरल और आंध्र प्रदेश में ताड़ी की नियंत्रित बिक्री से सरकार को अच्छा राजस्व मिलता है और वहां फ्लेवर्ड तथा वैल्यू-एडेड ताड़ी उत्पाद भी विकसित किए गए हैं।

हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद विभिन्न हितधारकों ने राज्य सरकार से मांग की है कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ संतुलन बनाते हुए ताड़ी उद्योग को विनियमित तरीके से संचालित करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करे, ताकि पारंपरिक आजीविका, ग्रामीण रोजगार और ताड़ के पेड़ों के संरक्षण को बढ़ावा मिल सके।

--आईएएनएस

डीएससी

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