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दोनों पक्षों को लगना चाहिए कि वे जीत गए, तभी अमेरिका-ईरान समझौता टिक पाएगा : शशि थरूर (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)


नई दिल्ली, 19 जून (आईएएनएस)। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका-ईरान शांति समझौते के टिके रहने के लिए दोनों पक्षों को यह महसूस होना चाहिए कि वे जीत गए हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तेहरान और वॉशिंगटन के अलावा, यह समझौता भारत समेत उन सभी देशों के लिए राहत की बात है, जो पश्चिम एशिया संकट के असर से जूझ रहे थे।

नई दिल्ली, 19 जून (आईएएनएस)। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका-ईरान शांति समझौते के टिके रहने के लिए दोनों पक्षों को यह महसूस होना चाहिए कि वे जीत गए हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तेहरान और वॉशिंगटन के अलावा, यह समझौता भारत समेत उन सभी देशों के लिए राहत की बात है, जो पश्चिम एशिया संकट के असर से जूझ रहे थे।

आईएएनएस से एक खास बातचीत में थरूर ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि अगर संसद में 'संविधान (131वां संशोधन) विधेयक- 2026' पास हो जाता है, तो लोकसभा में 850 सांसद होने की व्यावहारिकता क्या होगी। यहां पढ़िए बातचीत के मुख्य अंश।

सवाल : यूएस-ईरान शांति समझौते पर आपकी क्या राय है?

जवाब : शांति के हर समझौते में सभी पक्षों को महसूस होना चाहिए कि वे जीते हैं, वरना शांति कभी टिक नहीं पाएगी। आप ऐसा शांति समझौता नहीं कर सकते, जिसमें असल में एक पक्ष को हार माननी पड़े, जैसे पहले विश्व युद्ध के बाद वर्साय की संधि हुई थी, जिसकी वजह से दूसरा विश्व युद्ध हुआ। इसलिए, आप ऐसी स्थिति नहीं बनाना चाहेंगे, जहां शांति इसलिए न टिक पाए क्योंकि एक पक्ष को अपमानित महसूस कराया गया हो। मेरी नजर में, सबसे अच्छा शांति समझौता वह है, जिसमें दोनों पक्ष अपनी जनता को कुछ दे सकें और बाकी दुनिया उसका अपना विश्लेषण कर सके। अगर आप अमेरिकियों को देखें, तो वे कह सकते हैं कि देखिए ईरान अब यूरेनियम को एनरिच नहीं करेगा। उन्होंने एमओयू में वादा किया है कि वे आईएईए की देखरेख में अपने एनरिच्ड यूरेनियम को खत्म करेंगे। दूसरी तरफ, ईरान को भी कुछ ऐसी चीजें मिली हैं, जिनका वे जिक्र कर सकते हैं, जैसे कि प्रतिबंधों से राहत, पश्चिम में फ्रीज की गई संपत्ति का बहाल होना और देश में युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए पुनर्निर्माण में मदद। इस बीच, पूरी दुनिया को तेल की बढ़ती कीमतों, सामान की कमी, ईंधन संकट वगैरह का सामना करना पड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से हर तरह की चीजों प्रभावित हुई हैं। इसलिए, पूरी दुनिया कह सकती है कि हम सभी को फायदा हुआ है और अब हम शांति की ओर लौट सकते हैं। वैसे, यह सब तुरंत नहीं होगा, क्योंकि उदाहरण के लिए, होर्मुज जलडमरूमध्य में अभी भी बारूदी सुरंगें बिछी हुई हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि तेल की सप्लाई शुरू हो सकती है, लेकिन इसके लिए ईरान को पहले सभी बारूदी सुरंगें हटानी होंगी। युद्ध के दौरान तेल और गैस की कई सुविधाएं नष्ट हो गई थीं; उन्हें ठीक करना होगा, फिर से बनाना होगा और दोबारा चालू करना होगा। इसमें समय लगता है, यह रातों-रात नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि हम सभी को अभी कुछ और महीनों तक मुश्किल दौर से गुजरना होगा। अगर यह शांति बनी रहती है, तो हम लगभग एक या डेढ़ साल में उस स्थिति में वापस आ सकेंगे, जैसी युद्ध से पहले थी।

सवाल : अप्रैल में लोकसभा में परिसीमन और महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो पाया था। ऐसी खबरें हैं कि इसे मानसून सत्र में फिर से पेश किया जा सकता है?

जवाब : क्या सच में 850 सदस्यों वाली संसद हो सकती है? क्या दुनिया में कहीं 850 सदस्यों वाली संसद है? नहीं, ऐसी कोई संसद नहीं है। अमेरिका की आबादी तीन गुना बढ़ गई है, लेकिन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की कुल संख्या 435 ही है, क्योंकि वे जानते हैं कि अगर सदन बहुत बड़ा होगा, तो वह सार्थक नहीं रहेगा। आज अगर भारतीय संसद में 850 सदस्य हों, तो बहुत से ऐसे सदस्य होंगे जिन्हें जीरो आवर में बोलने का मौका नहीं मिलेगा, जो कभी अपने क्षेत्र का कोई मुद्दा नहीं उठा पाएंगे और कभी किसी बहस में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। 543 सदस्यों के साथ ही यह एक चुनौती है। 850 सदस्यों के साथ तो यह सचमुच नामुमकिन हो जाएगा। अमेरिका में सभी राज्यों के पास, चाहे वे बड़े हों या छोटे, दो-दो सीनेटर होते हैं। क्या भारत में भी हम इस विकल्प पर विचार कर सकते हैं? तब, राज्यों का ऊपरी सदन एक संतुलन बनाने वाले सदन के तौर पर काम करेगा। एक और विचार यह है कि यूरोपियन यूनियन में 27 देश हैं और हमारे यहां 28 राज्य हैं। यूरोपियन यूनियन का नियम है कि छोटे देशों के पास कम से कम और बड़े देशों के पास ज्यादा से ज्यादा सांसद होंगे। यानी एक न्यूनतम और अधिकतम सीमा तय है। क्या हमें भी ऐसा कुछ करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए? इससे उत्तर प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्यों के बीच का अंतर बहुत ज्यादा नहीं होगा। अभी तो संसद में सिक्किम की आवाज लगभग अनसुनी ही रह जाती है। ये ऐसे सवाल हैं जिन पर चर्चा और विचार-विमर्श होना चाहिए, न कि बस जल्दबाजी में सीटों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ाने का फैसला ले लिया जाए। 850 का आंकड़ा तो मजाक जैसा है; ऐसी संसद को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।

सवाल : पीएम मोदी हाल ही में भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता बन गए हैं। इस पर आप क्या कहेंगे?

जवाब : असल में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नहीं, बल्कि लगातार चुने जाने वाले सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता। मुझे लगता है कि हम सभी मानते हैं कि उनमें बहुत ज्यादा उत्साह और ऊर्जा है और उनका एक विजन है। आप उस विजन से सहमत हों या न हों, वे अपना विजन सामने रखते हैं। वे एक जबरदस्त वक्ता हैं, शायद हिंदी में इस देश ने जितने भी बेहतरीन वक्ता देखे हैं, उनमें से एक। वे खास तौर पर उन लोगों तक पहुंचते हैं, जो वह भाषा बोलते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी मौजूदगी बहुत प्रभावशाली है और इसमें कोई शक नहीं कि वे भारतीय जीवन, समाज और राजनीति के कई पहलुओं पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं। हालांकि, विपक्ष की तरफ से हमें कुछ नकारात्मक बातें भी देखने को मिली हैं। हमें देश में बढ़ती फूट और सांप्रदायिक बंटवारे की चिंता है। साथ ही, सत्ताधारी पार्टी और उनके समर्थकों की ओर से जिस तरह की राजनीतिक बयानबाजी को बढ़ावा दिया जा रहा है, उससे दुर्भाग्यवश आबादी का एक बड़ा हिस्सा अलग-थलग महसूस करने लगा है। पिछले 12 सालों में हमारे लोकतंत्र की स्वतंत्र और स्वायत्त संस्थाओं को जिस तरह से खोखला किया गया है, उसे लेकर कई तरह की वास्तविक चिंताएं हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि उन्होंने कई काम सही किए हैं, लेकिन इस दौरान ऐसी कई चीजें भी हुई हैं, जो भारत के लिए अच्छी नहीं हैं।

सवाल : तृणमूल कांग्रेस के टूटने पर आपकी क्या राय है?

जवाब : मुझे नहीं लगता कि किसी को भी इस बात में कोई शक है कि इसके पीछे कोई लालच, कोई फायदा या कोई धमकी रही होगी। और ऐसा सिर्फ सत्ताधारी पार्टी ही कर सकती है क्योंकि उनके पास ही ताकत है। जैसा कि आप जानते हैं, जो सबसे बड़ा गुट अलग हुआ है, यानी तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद, उन्होंने खुलकर कहा है कि वे अब एनडीए के साथ जुड़ेंगे। ये वही पार्टी के सांसद हैं, जो पिछले 12 सालों से लगातार एनडीए पर हमले करते रहे हैं। तो, अचानक से उनमें ये 'अच्छाई' नजर आना यह दिखाता है कि हमारे देश की राजनीति बिना सिद्धांतों वाली राजनीति बन गई है। और यह वाकई दुखद है। अपनी मान्यताओं पर अडिग रहें और मिलकर रचनात्मक ढंग से काम करें। मैंने हमेशा कहा है कि दूसरी तरफ वाले आपके दुश्मन नहीं हैं। वे आपके विरोधी हैं और आपका काम देश के सामूहिक हित के लिए काम करना है।

सवाल : अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे के पैसे के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं।

जवाब : यह सचमुच चौंकाने वाली बात है। मंदिर आस्था के केंद्र होते हैं। लोग वहां जाते हैं, भगवान से प्रार्थना करते हैं और उन्हें कुछ दान देते हैं। जब आप दान पेटी में कुछ डालते हैं या भगवान के सामने चढ़ावा चढ़ाते हैं, तो वह मंदिर के लिए होता है। इसका मकसद पवित्र होता है और इसका मतलब है कि इसका इस्तेमाल पूरी तरह से मंदिर के लिए ही होना चाहिए, किसी और काम के लिए नहीं। जब यह पता चलता है कि लाखों ही नहीं, बल्कि करोड़ों रुपए का गबन किया गया हो सकता है, तो यह भरोसे और आस्था के साथ इतना बड़ा धोखा है कि मैं हैरान रह गया। ऐसे में ज्यादातर सच्चे हिंदू भी यही महसूस करेंगे कि उनके साथ धोखा हुआ है कि ऐसी घटना हो सकती है।

--आईएएनएस

पीएसके/एबीएम

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