Office Address

Address Display Here

Phone Number

+91-9876543210

Email Address

info@deshbandhu.co.in

'दिल चीज क्या है आप मेरी जान…' के शायर शहरयार: यारों के यार, अदब के बादशाह


नई दिल्ली, 15 जून (आईएएनएस)। "दिल चीज क्या है, आप मेरी जान लीजिए..." और "इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं..." जैसे गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इन अमर गीतों के रचनाकार थे उर्दू अदब के बड़े शायर अखलाक मुहम्मद खान 'शहरयार'। लेकिन शहरयार सिर्फ एक बेहतरीन शायर ही नहीं थे, बल्कि यारों के यार और छात्रों के लिए एक बेहतरीन शिक्षक भी थे।

नई दिल्ली, 15 जून (आईएएनएस)। "दिल चीज क्या है, आप मेरी जान लीजिए..." और "इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं..." जैसे गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इन अमर गीतों के रचनाकार थे उर्दू अदब के बड़े शायर अखलाक मुहम्मद खान 'शहरयार'। लेकिन शहरयार सिर्फ एक बेहतरीन शायर ही नहीं थे, बल्कि यारों के यार और छात्रों के लिए एक बेहतरीन शिक्षक भी थे।

16 जून 1936 को उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के आंवला में जन्मे शहरयार ने अपनी शायरी से उर्दू साहित्य और हिंदी सिनेमा दोनों को नई ऊंचाइयां दीं। शहरयार का असली नाम अखलाक मुहम्मद खान था। उनके पिता अबू मुहम्मद खान पुलिस अधिकारी थे और चाहते थे कि बेटा भी पुलिस अफसर बने। मगर किस्मत को कुछ और मंजूर था। शहरयार का दिल किताबों, साहित्य और शायरी में बसता था। शुरुआती पढ़ाई के बाद वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे और यहीं से उनकी जिंदगी का रास्ता तय हुआ। 1961 में उन्होंने उर्दू साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की और बाद में एएमयू में अध्यापन से भी जुड़े।

शहरयार की शख्सियत का सबसे खूबसूरत पहलू उनकी सादगी थी। एएमयू के उर्दू विभाग के शिक्षकों और उनके समकालीनों का कहना था कि वे जितने बड़े शायर थे, उतने ही अच्छे इंसान भी थे। हर उम्र के लोगों से दोस्ती करना और नई पीढ़ी को अपनापन देना उनकी खास पहचान थी। शायद यही वजह थी कि लोग उन्हें प्यार से "यारों का यार" कहा करते थे।

1960 के दशक में उन्होंने शायरी लिखना शुरू किया। उनकी रचनाओं में जिंदगी की उदासी, इंसानी रिश्तों की जटिलता, मोहब्बत की नर्मी और समाज की बेचैनियां साफ दिखाई देती हैं। उनका मशहूर शेर आज भी लोगों की जुबां पर है—"सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है।"

यही वह अंदाज था जिसने शहरयार को अपने दौर के दूसरे शायरों से अलग पहचान दिलाई। उनकी शायरी में गहराई भी थी और सादगी भी। कठिन से कठिन भावनाओं को वे इतने आसान शब्दों में कहते थे कि हर पाठक और श्रोता खुद को उनसे जुड़ा हुआ महसूस करता था।

उनकी पहली पुस्तक 'इस्म-ए-आजम' 1965 में प्रकाशित हुई, लेकिन 'ख्वाब का दर बंद है' ने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई। इसी कृति के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। बाद में उन्हें भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया। वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़े तीसरे साहित्यकार थे जिन्हें यह सम्मान मिला।

हालांकि शहरयार की पहचान मुख्य रूप से शायर की थी, लेकिन हिंदी फिल्मों में उनके लिखे गीतों ने उन्हें घर-घर तक पहुंचा दिया। निर्देशक मुजफ्फर अली की फिल्म 'उमराव जान' के लिए लिखे उनके गीत आज भी सदाबहार माने जाते हैं। "दिल चीज क्या है", "इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं" और "जुस्तजू जिसकी थी" जैसे गीतों ने उन्हें फिल्मी दुनिया में अमर बना दिया।

हालांकि शहरयार खुद को फिल्मी गीतकार नहीं मानते थे। उनका मानना था कि गीत तभी लिखना चाहिए जब वह कहानी का हिस्सा हो और उसमें शायरी की गुंजाइश हो। शायद यही कारण था कि उन्होंने फिल्मों में बहुत कम काम किया, लेकिन जो लिखा वह इतिहास बन गया।

13 फरवरी 2012 को कैंसर की बीमारी के कारण शहरयार इस दुनिया से चले गए। लेकिन शायर कभी मरते नहीं, वे अपने शब्दों में जिंदा रहते हैं। शहरयार भी अपनी गजलों, नज्मों और गीतों के जरिए आज भी लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए हैं।

--आईएएनएस

पीआईएम/पीएम

Share:

Leave A Reviews

Related News